Wednesday, September 19, 2012

गाउट - यूरिक एसिड का आतंक



गाउट एक सामान्य रोग है जिसमें बार बार जोड़ में संधिशोथ (जोड़ में दर्द, सूजन, लालिमा, उष्णता और अक्षमता)  के दौरे पड़ते हैं। अधिकांश रोगियों (लगभग 50%) में पैर के अंगूठे के जोड़ (मेटाटारसल-फेलेंजियल जोड़) में तकलीफ होती है। तब इसे पोडोग्रा भी कहते हैं। लेकिन गाउट का असर एड़ी, घुटना, कलाई और उंगली के जोड़ में भी हो सकता है। जोड़ो में रात को अचानक बहुत तेज दर्द होता है और सूजन आ जाती है। जोड़ लाल और गर्म महसूस होता है। साथ में बुखार और थकावट भी हो सकती है। यह रोग रक्त में यूरिक एसिड का स्तर बढ़ने से होता है। यूरिक एसिड बढ़ने से जोड़, टेन्डन और जोड़ के आपसास जमा हो जाता है। यदि यह गुर्दें में जमा होता है तो पथरी या युरेट नेफ्रोपेथी हो सकती है।
गाउट का दौरा अमूमन 5-7 दिनों में ठीक हो जाता है। 60 रोगियों को साल भर में प्रायः दूसरा दौरा पड़ जाता है। गाउट के रोगियों को रक्तचाप, डायबिटीज, मेटाबोलिक सिन्ड्रोम, वृक्क रोग और हृदय रोग का खतरा अधिक रहता है। यदि उपचार नहीं किया जाये तो गाउट धीरे-धीरे दीर्घकालीन और स्थाई रोग बन जाता है। जोड़ों की सतह क्षतिग्रस्त होने लगती है। अक्षमता और अपंगता बढ़ती जाता है। साथ ही शरीर में कई जगह (जैसे कान, कोहनी आदि) यूरिक एसिड जमा होने से दर्दहीन गांठें (Tophi) बन जाती हैं। यदि गुर्दे में पथरी बन जाये तो स्थिति और जटिल बन जाती है। वृक्कवात (Kidney Failure) हो सकता है।
प्राचीन काल में इसे राजरोग या अमीरों का रोग भी कहा जाता था, क्योंकि मांस-मछली और मदिरा सेवन से इस रोग का सीधा सम्बन्ध है। ब्रिटेन के किंग हेनरी को भी गाउट हुआ था। गाउट के निदान हेतु जोड़ में से सायनोवियल द्रव निकाल कर जांच की जाती है, उसमें यूरिक एसिड के क्रिस्टल्स की उपस्थिति से गाउट की पुष्टि हो जाती है। पिछले दो दशकों में गाउट का आघटन दो गुना हो गया है।
कारण
प्यूरीन चयापचय में आई खराबी गाउट का मूल कारण है। यूरिक एसिड प्यूरीन चयापचय का अंतिम उत्पाद है, जो गाउट में बढ़ जाता है। इसके कारण आहार, आनुवंशिकता, गुर्दे में यूरिक एसिड का उत्सर्जन कम होना आदि माने गये हैं। 90% रोगियों में गुर्दे यूरिक एसिड का पर्याप्त उत्सर्जन नहीं कर पाते हैं। 10% से कम रोगियों में ज्यादा यूरिक एसिड बनता  हैं। यदि यूरिक एसिड 7-8.9  mg/dl हो तो गाउट का सालाना जोखिम  0.5%  और 9  mg/dl से अधिक हो तो जोखिम  4.5% रहता है। यूरिक एसिड का सामान्य स्तर पुरुष में 7 और स्त्री में 6 mg/dl होता है।
जीवनशैली – 12% रोगियों में गाउट का कारण आहार को माना गया है। मदिरा सेवन, फ्रुक्टोज-युक्त पेय, मांस, मछली के सेवन से गाउट का जोखिम बढ़ता है।  
रोग – मेटाबोलिक सिन्ड्रोम, मोटापा, पॉलीसायथीमिया, लेड पॉयजनिंग, वृक्कवात, हीमोलिटिक एनीमिया, सोरायसिस और अंग प्रतिस्थापन में भी गाउट की संभावना रहती है। 
औषधियां – मूत्रवर्धक दवाइयां (हाइड्रोक्लोरथायडाइड), नायसिन, एस्पिरिन, साइक्लोस्पोरिन और टेक्रोलिमस आदि। 
उपचार
प्रारंभिक उपचार का उद्देष्य संधिशोथ के दौरे को शांत करना है। बार-बार पड़ने वाले दौरों को रोकने के लिए यूरिक  एसिड कम करने की दवाइयां दी जाती हैं। साथ में दर्द और सूजन कम करने के लिए नॉन-स्टीरॉयडल एंटीइन्फ्लेमेट्री दवाइयां (NSAIDs), कोलचिसीन और स्टिरॉयड्स दिये जाते हैं। NSAIDs प्रायः 1-2 हफ्ते तक दिये जाते हैं। यदि ये सब दवाइयां असर नहीं कर रही हो तो नई दवा पेग्लोटिकेस (इसे 2010 में अनुमोदित किया गया है) दी जाती है।
दौरों को रोकने के लिए ज़ेंथीन ऑक्सीडेज इन्हिबीटर्स (ऐलोप्यूरिनॉल और फेब्युक्सोस्टेट) और युर्कोसुरिक्स (प्रोबेनसिड और सल्फिनपायरेजोल) आदि देते हैं। इन्हें प्रायः गाउट का दौरा पड़ने के 1-2 हफ्ते के बाद शुरू करते हैं और लम्बे समय तक दी जाती हैं। यदि यूरिक एसिड का निर्माण 800 मिलिग्राम प्रति दिन से अधिक हो तो ज़ेंथीन ऑक्सीडेज इन्हिबीटर्स दी जाती हैं। रोगी को अपना यूरिक एसिड 6 से कम रखने की सलाह दी जाती है।
अन्य उपचार
बर्फ की सिकाई - इसके लिए दिन में कई बार बर्फ की सिकाई की जाती है, जिससे दर्द में राहत मिलती है। बर्फ की सिकाई के बीच-बीच में टॉवल को गर्म पानी में निचोड़ कर जोड़ पर लपेट देना चाहिये। सिकाई के बाद भी जोड़ों पर टॉवल लपेट देना चाहिये, ताकि सूजन कम हो और रोगी को नींद आ जाये।
दवा
कोल्चिसिन (Colchicine)
प्रोबेनसिड
(Probenecid)
ऐलोप्युरिनोल (Allopurinol)
फेब्युक्सोस्टेट
(Febuxostat)
ब्रांड और प्रस्तुति
टेब कोल्चिसिन्डोन, जाइकोल्चिन
0.5 मि. ग्राम
टेब बेनसिड
500 मि. ग्राम
टेब जाइलोरिक, सिप्लोरिक
100 और 300 मि. ग्राम
टेब फेब्युटास
40 और  80 मि. ग्राम
मात्रा
गाउट के दौरे में – शुरू में 1  मि. ग्राम, हर  घंटे में 0.5 मि. ग्राम जब तक दर्द नहीं मिट जाये, (अधिकतम 10 मि. ग्राम)
बचाव- 0.5-1.5 मि.ग्राम 7 दिन तक   
शुरूमें 5.25 ग्राम (150 एमएल पानी में) दो बार,
मेन्टेनेन्स – 3.5 ग्राम (150 एमएल पानी में) 
100 मिलिग्राम रोजाना, अधिकतम मात्रा 800 मि. ग्राम
40-80 मिलिग्राम रोज
कुप्रभाव
पेट दर्द, उबकाई, वमन, दस्त, बोनमेरो दमन, मायोपेथी
अपच, पेट फूलना, आहार पथ मे रुकावट
त्वचा में चकत्ते, ठंड लग कर बुखार,जोड़ों में दर्द, पीलिया, इयोसिनोफीलिया, ल्युकोपीनिया या ल्युकोसाइटोसिस
छाती में दर्द, अचानक भ्रम, बांह, टांगों या चेहरे में सुन्नता, त्वचा में खुजली, चकत्ते, श्वासकष्ट, संक्रमण, यकृत विकार
चेरी है चमत्कारी –  60 वर्ष पहले डॉ. लुडविग डब्ल्यु ब्लॉ जो गाउट से पीड़ित थे और उनका जीवन व्हील चेयर के सहारे चल रहा था। एक दिन उन्होंने पाव भर सारी चेरी खाई, जिससे उनका सारा दर्द जाता रहा। उन्होंने इस विषय पर शोध काफी की और गाउट के रोगियों को 180-240 ग्राम चेरी रोज खाने की सलाह देने लगे।
अलसी और चारकोल की पुलटिस – डॉ. थ्रेश कहते हैं कि अलसी और चारकोल की पुलटिस शरीर से टॉक्सिन और यूरिक एसिड खींच लेती है और गाउट में बहुत राहत देती है। 2-4 टेबलस्पून पिसी अलसी और आधा कप चारकोल को गर्म पानी में अच्छी तरह मिला कर पुलटिस बनाई जाती है। जोड़ पर इसका लेप करके पट्टी बांध दी जाती है। हर 4-6 घंटे में पुलटिस और पट्टी बदल दी जाती है। रात भर पुलटिस लगी रहने दें, बस ध्यान रखें कि बिस्तर खराब न हो। इसके लिए आप पट्टी के ऊपर पॉलीथीन लपेट सकते हैं। चारकोल की गोली दिन में चार बार पानी के साथ खाने से भी फायदा होता है। आधा या एक घंटे पैर को चारकोल या इप्सम के घोल में रखने से भी फायदा होता है।
अलसी -  
गाउट में अलसी बहुत कारगर साबित हुई है। अलसी के लिगनेन और ओमेगा-3 फैटी एसिड्स प्रदाह को शान्त करते हैं। दर्द, सूजन में राहत मिलती है। ट्यूनिस में हुई शोध से साबित हुआ है कि अलसी शरीर में यूरिक एसिड का स्तर कम करता है। अलसी को रोटी के रूप में लेना सुविधाजनक रहता है। शीतल विधि से निकला अलसी का तेल पनीर या दही में मिला कर लिया जा सकता है।   

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